डिफ़ॉल्ट नई रिजीम में स्लैब-दर-स्लैब टैक्स, ₹12 लाख की रिबेट, मार्जिनल रिलीफ़, नियोक्ता NPS और कैपिटल गेन्स के साथ।
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नई रिजीम व्यक्तियों पर टैक्स लगाने का आसान तरीका है: ज़्यादा स्लैब में बँटी कम दरें, बड़ी रिबेट, और ट्रैक करने के लिए लगभग कोई छूट या कटौती नहीं। यह FY 2023-24 से डिफ़ॉल्ट है, और बजट 2025 के बदलावों के बाद, जिन्हें बजट 2026 ने बनाए रखा, ज़्यादातर नौकरीपेशा लोगों के लिए यही सस्ता विकल्प है।
यह कैलकुलेटर ठीक-ठीक दिखाता है कि आपका टैक्स कैसे बनता है: आपकी आय का कितना हिस्सा हर स्लैब में आता है, हर स्लैब का कितना टैक्स है, रिबेट या मार्जिनल रिलीफ़ लागू होती है या नहीं, और महीने के हिसाब से इसका क्या मतलब है।
बिना दूसरी आय वाली सैलरी पर FY 2026-27 का नई रिजीम टैक्स, ₹75,000 स्टैंडर्ड डिडक्शन के बाद, 4% सेस सहित:
| ग्रॉस सैलरी | साल का टैक्स | हर महीने | असरदार दर |
|---|---|---|---|
| ₹12.75 लाख | ₹0 | ₹0 | 0.0% |
| ₹13 लाख | ₹26,000 | ₹2,167 | 2.0% |
| ₹15 लाख | ₹97,500 | ₹8,125 | 6.5% |
| ₹18 लाख | ₹1,50,800 | ₹12,567 | 8.4% |
| ₹20 लाख | ₹1,92,400 | ₹16,033 | 9.6% |
| ₹25 लाख | ₹3,19,800 | ₹26,650 | 12.8% |
| ₹30 लाख | ₹4,75,800 | ₹39,650 | 15.9% |
| ₹50 लाख | ₹10,99,800 | ₹91,650 | 22.0% |
असरदार दर स्लैब दर से काफ़ी कम रहती है: ₹30 लाख पर भी टैक्स सैलरी का लगभग 16% है।
HRA और होम लोन जैसे बड़े डिडक्शन हों तो पुरानी रिजीम टैक्स कैलकुलेटर देखें, या दोनों की तुलना सैलरी टैक्स प्लानर में करें।
| टैक्स योग्य आय | दर |
|---|---|
| ₹4,00,000 तक | शून्य |
| ₹4,00,001 – ₹8,00,000 | 5% |
| ₹8,00,001 – ₹12,00,000 | 10% |
| ₹12,00,001 – ₹16,00,000 | 15% |
| ₹16,00,001 – ₹20,00,000 | 20% |
| ₹20,00,001 – ₹24,00,000 | 25% |
| ₹24,00,000 से ऊपर | 30% |
टैक्स पर 4% हेल्थ और एजुकेशन सेस जोड़ा जाता है। सरचार्ज सिर्फ़ ₹50 लाख से ऊपर लगता है।
FY 2026-27 में 60 से कम उम्र के नौकरीपेशा व्यक्ति, बिना किसी अन्य आय या नियोक्ता NPS के। टैक्स योग्य आय ₹75,000 के स्टैंडर्ड डिडक्शन के बाद की है।
| कुल सैलरी | टैक्स योग्य आय | सेस सहित टैक्स | प्रभावी दर |
|---|---|---|---|
| ₹7,00,000 | ₹6,25,000 | ₹0 | 0% |
| ₹12,75,000 | ₹12,00,000 | ₹0 | 0% |
| ₹13,00,000 | ₹12,25,000 | ₹26,000 | 2% |
| ₹20,00,000 | ₹19,25,000 | ₹1,92,400 | 9.6% |
| ₹35,00,000 | ₹34,25,000 | ₹6,31,800 | 18.1% |
₹12.75 लाख से ₹13 लाख की छलाँग मार्जिनल रिलीफ़ का असर दिखाती है: टैक्स ₹12 लाख की टैक्स योग्य सीमा से ऊपर कमाए गए ₹25,000 (और सेस) तक सीमित है, पूरे स्लैब टैक्स तक नहीं। ₹35 लाख पर भी प्रभावी दर 30% की सबसे ऊँची दर से काफ़ी नीचे रहती है।
FY 2026-27 में ₹97,500, यानी लगभग ₹8,125 हर महीने। ₹75,000 के स्टैंडर्ड डिडक्शन के बाद ₹14.25 लाख टैक्सेबल रहता है। दूसरी सैलरी पर:
इनमें 4% सेस शामिल है, और कोई दूसरी आय नहीं मानी गई है।
हाँ, नई रिजीम में। स्टैंडर्ड डिडक्शन से टैक्सेबल आय ₹12 लाख रह जाती है, और 87A रिबेट उस पर टैक्स ख़त्म कर देता है।
ग्रॉस सैलरी साल भर की आपकी कुल सैलरी है, किसी भी टैक्स-फ़्री भत्ते या कटौती को घटाने से पहले: बेसिक पे, DA, HRA, स्पेशल अलाउंस, LTA, बोनस, अन्य भत्ते और टैक्स योग्य पर्क्स। नियोक्ता से मिले Form 16 में यह दिखती है। पुरानी और नई रिजीम के कैलकुलेटर में आप सालाना कुल रकम डालते हैं; प्लानर हर हिस्सा अलग पूछकर जोड़ देता है।
CTC वह है जो नियोक्ता आप पर ख़र्च करता है, इसलिए उसमें नियोक्ता का PF हिस्सा, ग्रेच्युटी का प्रावधान और ग्रुप इंश्योरेंस भी होते हैं, जो आपकी ग्रॉस सैलरी में नहीं आते। इन-हैंड सैलरी वह है जो आपका अपना PF, प्रोफ़ेशनल टैक्स और TDS कटने के बाद बैंक में आती है। टैक्स ग्रॉस सैलरी से शुरू होता है, इन दोनों से नहीं। नियोक्ता का NPS अपवाद है: वह ग्रॉस सैलरी में जुड़ता है और फिर से घटता है।
पुरानी रिजीम: ग्रॉस सैलरी, घटा टैक्स-फ़्री भत्ते (HRA, LTA, बच्चों के भत्ते), घटा ₹50,000 का स्टैंडर्ड डिडक्शन और प्रोफ़ेशनल टैक्स, जोड़ें ब्याज या किराये जैसी अन्य आय, घटाएँ 80C, 80D और होम-लोन ब्याज जैसी कटौतियाँ। नई रिजीम: ग्रॉस सैलरी, घटा ₹75,000 का स्टैंडर्ड डिडक्शन और नियोक्ता का NPS, जोड़ें अन्य आय। दोनों में ग्रेच्युटी और लीव एनकैशमेंट का टैक्स-फ़्री हिस्सा भी घटता है। जो बचता है वही आपकी टैक्सेबल इनकम है, जिस पर स्लैब दरें लगती हैं।
₹4 लाख तक शून्य; ₹4–8 लाख पर 5%; ₹8–12 लाख पर 10%; ₹12–16 लाख पर 15%; ₹16–20 लाख पर 20%; ₹20–24 लाख पर 25%; और ₹24 लाख से ऊपर 30%। बजट 2026 ने ये स्लैब FY 2025-26 जैसे ही रखे, और ये हर उम्र के लिए एक जैसे हैं।
सैलरी या पेंशन पर ₹75,000 का स्टैंडर्ड डिडक्शन, नियोक्ता का NPS (बेसिक + DA के 14% तक), अग्निवीर कॉर्पस योगदान, और फ़ैमिली पेंशन जैसी कुछ अन्य। 80C, 80D, HRA, LTA और स्वयं के रहने वाले घर के होम-लोन का ब्याज नहीं मिलता।
₹50 लाख से ऊपर 10%, ₹1 करोड़ से ऊपर 15% और ₹2 करोड़ से ऊपर 25%। पुरानी रिजीम के उलट, नई रिजीम में कभी 37% नहीं लगता। हर सीमा से ठीक ऊपर मार्जिनल रिलीफ़ लागू होती है।
नहीं, यह डिफ़ॉल्ट है। कुछ करना तभी है जब आप पुरानी रिजीम चाहते हैं: TDS के लिए नियोक्ता को बताएँ, और रिटर्न भरते समय उसे चुनें।
1 अप्रैल 2026 से नई रिजीम धारा 202 (पहले 115BAC) में है और रिबेट धारा 156 (पहले 87A) में। दरें और सीमाएँ खुद नहीं बदलीं।
नियोक्ता TDS एक अनुमान पर काटता है: साल भर में वह आपको जितनी सैलरी देगा और आपने जो प्रूफ़ जमा किए। बोनस, नौकरी बदलना, जिन निवेशों का ज़िक्र नहीं किया, या ब्याज की आय से अंतिम आँकड़ा बदल सकता है। असल टैक्स वह है जो रिटर्न में निकलता है: ज़्यादा कटा TDS रिफ़ंड बनकर लौटता है, और कमी हो तो रिटर्न भरने से पहले सेल्फ़-असेसमेंट टैक्स के रूप में भरनी होती है।
दोनों नियोक्ताओं की सैलरी जोड़कर कुल रकम डालें। स्टैंडर्ड डिडक्शन और हर कटौती की सीमा पूरे साल में एक ही बार मिलती है। हो सकता है दोनों नियोक्ताओं ने अपने-अपने TDS में 0% स्लैब और रिबेट दे दी हो, इसलिए अक्सर टैक्स कम कटता है: नए नियोक्ता को पिछली सैलरी का ब्योरा (Form 12B) दें, या रिटर्न भरने से पहले बाकी टैक्स भर दें।
जिस घर में आप रहते हैं, उसके लोन का ब्याज नई रिजीम में घटता नहीं, और 80C में मूलधन भी नहीं। अगर बड़ा होम लोन ही आपकी मुख्य कटौती है, तो दोनों रिजीम की तुलना करें: ब्याज और मूलधन मिलकर अक्सर पुरानी रिजीम को सस्ता बना देते हैं।
नहीं। कर्मचारी की मृत्यु के बाद नॉमिनी या क़ानूनी वारिसों को मिली ग्रेच्युटी उन पर टैक्स नहीं होती। इस कैलकुलेटर की सीमाएँ उस ग्रेच्युटी पर हैं जो कर्मचारी को रिटायरमेंट या इस्तीफ़े पर मिलती है।
टैक्स योग्य हिस्सा उस साल की सैलरी में जुड़ता है। चूँकि यह कई सालों में कमाया गया है, आप एक साल में इकट्ठी मिली सैलरी पर राहत (पहले की सेक्शन 89 वाली राहत) क्लेम कर सकते हैं, रिटर्न से पहले ई-फ़ाइलिंग पोर्टल पर राहत का फ़ॉर्म भरकर। इससे टैक्स ऐसे दोबारा निकलता है जैसे रकम पिछले सालों में बँटी हो।
हाँ, पूरी, उस साल की सैलरी के हिस्से के रूप में, दोनों रिजीम में। छूट सिर्फ़ नौकरी छोड़ते समय, रिटायरमेंट या इस्तीफ़े पर भुनाई गई छुट्टी पर मिलती है।
आपकी बेसिक पे, साथ में DA अगर वह रिटायरमेंट लाभों में गिना जाता है, और टर्नओवर के तय प्रतिशत वाला कमीशन, नौकरी छोड़ने से ठीक पहले के 10 महीनों का औसत। HRA और स्पेशल अलाउंस जैसे भत्ते शामिल नहीं होते, इसीलिए टैक्स-फ़्री रकम अक्सर उम्मीद से कम निकलती है।
नहीं। यह सैलरी और पेंशन पर एक तय रकम है: नई रिजीम में ₹75,000 और पुरानी में ₹50,000। यह अपने-आप लगता है, आपने असल में कितना भी खर्च किया हो, और साल में एक ही बार मिलता है, भले दो नियोक्ता रहे हों।
हाँ। पूर्व नियोक्ता से मिलने वाली पेंशन सैलरी की तरह टैक्स होती है, इसलिए उस पर वही स्टैंडर्ड डिडक्शन मिलता है। परिवार के सदस्य की मृत्यु के बाद मिलने वाली फ़ैमिली पेंशन अलग है: उस पर एक-तिहाई की कटौती मिलती है, नई रिजीम में ₹25,000 तक और पुरानी में ₹15,000 तक।
हाँ। 14% (या 10%) की सीमा के अलावा, EPF, NPS और सुपरएनुएशन में नियोक्ता का कुल योगदान सालाना ₹7.5 लाख तक ही टैक्स-फ़्री है। इससे ऊपर की रकम, उस पर मिले रिटर्न के साथ, पर्क्विज़िट के रूप में टैक्स होती है।
नई रिजीम में बची हुई गिनी-चुनी कटौतियों में से यह एक है: बेसिक + DA का 14% तक आपकी टैक्स योग्य सैलरी से घटता है। पैसा 60 तक लॉक रहता है, इसलिए यह लंबी अवधि की बचत के लिए ठीक है, जल्द चाहिए पैसे के लिए नहीं। हर नियोक्ता यह विकल्प नहीं देता, HR से पूछें।
किराये से शुरू करें, आपका भरा म्युनिसिपल टैक्स घटाएँ, फिर मरम्मत के लिए एक तय 30%, फिर होम-लोन का पूरा ब्याज (किराये पर दिए मकान पर ₹2 लाख की सीमा नहीं)। जो बचता है वह दोनों रिजीम में स्लैब दरों पर आपकी आय में जुड़ता है।
पुरानी रिजीम में ₹2 लाख तक का घाटा आपकी सैलरी और अन्य आय से घटता है; बाकी 8 साल के लिए आगे जाता है, पर सिर्फ़ आगे की मकान-संपत्ति की आय के सामने। नई रिजीम में घाटा न अन्य आय घटा सकता है, न आगे जा सकता है, इसलिए वह ख़त्म हो जाता है।
हाँ। यह म्युनिसिपल टैक्स के बाद किराये का तय 30% है, बिल की ज़रूरत नहीं। दूसरी तरफ़, असल मरम्मत, रखरखाव या सोसायटी चार्ज अलग से नहीं घटाए जा सकते।
हाँ, निवासियों के लिए। जब टैक्स योग्य आय ₹12 लाख या कम हो, तो ₹60,000 तक की रिबेट स्लैब टैक्स को खत्म कर देती है। नौकरीपेशा लोगों को पहले ₹75,000 का स्टैंडर्ड डिडक्शन भी मिलता है, इसलिए ₹12.75 लाख तक की सैलरी पर कोई टैक्स नहीं।
इसके बिना ₹12,10,000 कमाने पर लगभग ₹61,500 टैक्स लगता, जबकि ₹12,00,000 पर कुछ नहीं। मार्जिनल रिलीफ़ टैक्स को उतनी रकम तक सीमित करती है जितनी आय ₹12 लाख से ज़्यादा है, इसलिए ₹12,10,000 पर ₹10,000 और सेस लगता है। यह रिलीफ़ लगभग ₹12.7 लाख की टैक्स योग्य आय पर ख़त्म हो जाती है।
नहीं। FY 2025-26 से रिबेट खास दरों वाले गेन्स पर टैक्स नहीं घटा सकती: इक्विटी STCG (20%) और LTCG (12.5%)। फिर भी ये गेन्स ₹12 लाख की सीमा में गिने जाते हैं, इसलिए ₹12.75 लाख की सैलरी के साथ सिर्फ़ ₹1 लाख का टैक्स-फ़्री इक्विटी LTCG भी पूरी ₹60,000 की रिबेट खत्म कर देता है। असर देखने के लिए कैलकुलेटर में अपने गेन्स भरें।
नहीं। रिबेट (87A, अब सेक्शन 156) सिर्फ़ निवासी (रेज़िडेंट) व्यक्तियों के लिए है। अनिवासी को 0% स्लैब से ऊपर पहले रुपये से स्लैब टैक्स देना होता है, भले कुल आय ₹12 लाख से कम हो।
सैलरी के अलावा जो कुछ भी आपकी स्लैब दर पर टैक्स होता है: FD और RD का ब्याज, फ़्रीलांस या कंसल्टिंग फ़ीस, फ़ैमिली पेंशन, या इनकम टैक्स रिफ़ंड पर मिला ब्याज। PPF के ब्याज जैसी टैक्स-फ़्री आय छोड़ दें, और शेयर व म्यूचुअल फ़ंड के गेन कैपिटल गेन्स वाले सेक्शन में डालें।
हाँ। ब्याज, फ़्रीलांस आय और स्लैब दर वाली हर आय गिनी जाती है, और कैपिटल गेन्स भी। थोड़ा-सा ब्याज भी आपको ₹12 लाख के ठीक पार ले जा सकता है; तब मार्जिनल रिलीफ़ टैक्स को सीमा से ऊपर की रकम तक सीमित रखती है।
हाँ। FD का ब्याज आपकी आय में जुड़ता है और आपकी स्लैब दर पर टैक्स होता है, हर साल जितना बनता है, भले अभी हाथ में न आया हो। बैंक का 10% TDS सिर्फ़ एडवांस है: उसे क्रेडिट के रूप में लें, और ऊँचे स्लैब में हों तो बाकी भरें।
नहीं। कैपिटल लॉस सिर्फ़ कैपिटल गेन्स से घटाया जा सकता है: शॉर्ट-टर्म लॉस किसी भी गेन से, लॉन्ग-टर्म लॉस सिर्फ़ लॉन्ग-टर्म गेन से। जो बचे वह 8 साल तक आगे जाता है, पर तभी जब आप रिटर्न नियत तारीख तक भरें।
लिस्टेड शेयर और इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड 12 महीने के बाद लॉन्ग-टर्म होते हैं। प्रॉपर्टी, सोना और अनलिस्टेड शेयर जैसी ज़्यादातर दूसरी संपत्तियाँ 24 महीने के बाद। 1 अप्रैल 2023 या उसके बाद ख़रीदे गए डेट म्यूचुअल फ़ंड पर, कितना भी रखें, स्लैब दर से टैक्स लगता है।
दोनों में से कोई नहीं। यह हर व्यक्ति के लिए सालाना ₹1.25 लाख है, आपके सभी लिस्टेड शेयर और इक्विटी फ़ंड को मिलाकर। परिवार के हर सदस्य को अपनी छूट मिलती है, इसलिए जीवनसाथी या माता-पिता के नाम के निवेश पर अलग छूट है।
कुल सैलरी में से ₹75,000 का स्टैंडर्ड डिडक्शन (नौकरीपेशा हों तो) और मान्य नियोक्ता NPS कटौती घटाकर, अन्य आय जोड़ने पर टैक्स योग्य आय मिलती है, जिसे नज़दीकी ₹10 तक राउंड किया जाता है। टैक्स स्लैब-दर-स्लैब गिना जाता है। अगर टैक्स योग्य आय ₹12 लाख या कम है, तो ₹60,000 तक की रिबेट उसे शून्य कर देती है; ठीक ऊपर, मार्जिनल रिलीफ़ टैक्स को ₹12 लाख से ऊपर की आय तक सीमित करती है।
कैपिटल गेन्स ऊपर से जुड़ते हैं। पहले नुकसान घटाया जाता है: शॉर्ट-टर्म लॉस किसी भी गेन से, लॉन्ग-टर्म लॉस सिर्फ़ लॉन्ग-टर्म गेन से। स्लैब-दर वाले गेन आय में जुड़ते हैं; इक्विटी STCG पर 20%, ₹1.25 लाख से ऊपर इक्विटी LTCG पर 12.5% और अन्य LTCG पर 12.5% टैक्स लगता है। ये गेन्स ₹12 लाख की रिबेट सीमा में गिने जाते हैं, पर रिबेट इनका टैक्स नहीं घटा सकती, और इन पर सरचार्ज 15% तक सीमित है।
₹50 लाख से ऊपर, हर सीमा पर मार्जिनल रिलीफ़ के साथ सरचार्ज (10%, 15% या 25%) जोड़ा जाता है, फिर 4% सेस, और कुल को नज़दीकी ₹10 तक राउंड किया जाता है।
टैक्स योग्य आय
कुल सैलरी − ₹75,000 − min(नियोक्ता NPS, 14% × (बेसिक + DA)) + अन्य आय
मार्जिनल रिलीफ़ के साथ रिबेट
रिबेट के बाद टैक्स = 0 अगर टैक्स योग्य ≤ ₹12L, वरना min(स्लैब टैक्स, टैक्स योग्य − ₹12L)
कैपिटल गेन्स पर टैक्स
20% × इक्विटी STCG + 12.5% × (इक्विटी LTCG − ₹1.25L) + 12.5% × अन्य LTCG, नुकसान घटाने के बाद
कुल टैक्स
(रिबेट के बाद टैक्स + सरचार्ज) × 1.04
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टैक्स के आँकड़े आपके चुने गए टैक्स वर्ष के आयकर अधिनियम के नियमों पर, हमारी समझ के अनुसार, आधारित हैं और कुछ ख़ास स्थितियों (जैसे दुर्लभ सरचार्ज या सेट-ऑफ़ के मामले) को सरल बनाते हैं। हर बजट के साथ टैक्स कानून बदलता है, इसलिए रिटर्न भरने से पहले अपने अंतिम आँकड़े किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट या आयकर विभाग के ई-फ़ाइलिंग पोर्टल से जाँच लें।